मिट्टी कितने प्रकार की होती है? – Mitti Kitne Prakar Ki Hoti Hai (Know 7 Types Of Soils)

हेलो छात्रों आज के इस आर्टिकल में हम जानेंगे मिट्टी के प्रकार के बारे में कि मिट्टी कितने प्रकार की होती है तथा इसके साथ-साथ उसकी डिटेल्स भी जानेंगे कि कौन सी मिट्टी कैसी होती है।

“अगर आप एक स्टूडेंट हैं तो आपसे यह प्रश्न परीक्षा में भी पूछा जा सकता है इसलिए इस आर्टिकल को पूरा जरूर पढ़िएगा।”

“”आपसे यह प्रश्न परीक्षा में निम्न प्रकार से पूछा जा सकता है-

मिट्टी किसे कहते हैं तथा यह कितने प्रकार की होती है उनका वर्णन कीजिए। अथवा

मिट्टी के प्रकारों को विस्तार से बताइए।“”

कुछ इसी टाइप के प्रश्न आपसे पूछे जा सकते हैं तो आपको निःसंकोच इसका उत्तर दे देना है जो हम अभी आपको बताएंगे। तो चलिए शुरू करते हैं।

मिट्टी के प्रकार और वितरण – Mitti Kitne Prakar Ki Hoti Hai

भारत एक विशाल देश है अतः इसकी रचना एवं जलवायु में बड़ी भिन्नता मिलती है। इस भिन्नता का यहां की मिट्टियों पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यहां भिन्न-भिन्न भागों में भिन्न-भिन्न प्रकार की मिट्टियाँ मिलती हैं, किंतु मोटे तौर पर हम भारत की मिट्टियों को निम्नलिखित भागों में बांट सकते हैं।

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मिट्टी (मृदा) के प्रकार – Mitti Ke Prakar

  • जलोढ़ मिट्टी
  • काली मिट्टी
  • लाल मिट्टी
  • लेटराइट मिट्टी
  • हिमालय प्रदेश की मिट्टी
  • ऊसर या कल्लर मिट्टी

चलिए अब इनके बारे में डिटेल में जानकारी लेते हैं-

1. जलोढ़ मिट्टी (Alluvial Soil)

नदियों द्वारा बहाकर लाई गई मिट्टी को जलोढ़ मिट्टी कहा जाता है। भारत में सबसे अधिक विस्तार इस मिट्टी का है। समूचा उत्तरी मैदान इसी मिट्टी से बना हुआ है।

असम, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, पंजाब और राजस्थान के लगभग 7,68,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में इस मिट्टी का विस्तार है। दक्षिण भारत में नदियों के डेल्टाई भागों में भी यह मिट्टी पाई जाती है।

यह मिट्टी एक प्रकार से दोमट मिट्टी है। इसमें बालू और चीका का मिश्रण होता है। इस मिश्रण के आधार पर जलोढ़ मिट्टी के तीन भाग किए जाते हैं-

(1.) पुरातन जलोढ़ मिट्टी (2.) नूतन जलोढ़ मिट्टी एवं (3.) डेल्टाई जलोढ़ मिट्टी।

(1.) पुरातन जलोढ़ मिट्टी-

यह मिट्टी उन स्थानों पर पाई जाती है, जहां बाढ़ का पानी नहीं पहुंचता है। इस मिट्टी का नवीनीकरण भी नहीं होता है। इसमें चीका की मात्रा कम होती है। इसे बांगर मिट्टी भी कहा जाता है।

(2.) नूतन जलोढ़ मिट्टी-

यह मिट्टी उन स्थानों पर पाई जाती है जहां बाढ़ का पानी पहुंचता है। इस मिट्टी में कीचड़ और चीका की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक होती है। प्रतिवर्ष इसका नवीनीकरण होता रहता है, अतः यह बहुत उपजाऊ होती है। इसे खादर मिट्टी भी कहते हैं।

(3.) डेल्टाई जलोढ़ मिट्टी-

यह मिट्टी नदियों के डेल्टाई भाग में मिलती है। यह बहुत चीकायुक्त होती है। इसमें जीवांश की मात्रा भी अधिक होती है। अतः यह बहुत ही उपजाऊ होती है।

आइए अब जलोढ़ मिट्टी की कुछ विशेषताओं के बारे में जानते हैं-

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जलोढ़ मिट्टी की विशेषताएं – Jalodh Mitti Ki Visheshtayen

  1. यह बालू और चीका के मिश्रण से बनी भुरभुरी मिट्टी है, जिसमें फसलों का उगना तथा सरलता से खुराक प्राप्त करना संभव होता है।
  2. यह हल्के भूरे रंग की एवं गहरी होती है। इसकी गहराई 450 मीटर तक पाई गई है।
  3. इस मिट्टी के क्षेत्र चौरस होते हैं जिन पर कुएँ खोदना, नहरे निकलना एवं खेती करना बहुत सुगम होता है।
  4. इसमें नमी धारण करने की क्षमता अधिक होती है।
  5. इसमें पोटाश, फास्फोरस, चूना व वनस्पति अंश की अधिकता पाई जाती है।
  6. इसमें नाइट्रोजन की कमी होती है। अतः खाद देने पर यह अच्छी उपज देती है।
  7. इस मिट्टी के वे क्षेत्र जहां बाढ़ का पानी नहीं पहुंचता, मिट्टी का नवीनीकरण नहीं हो पता। अतः इसमें चीका की मात्रा कम होती है। इसे बांगर मिट्टी भी कहा जाता है। इसमें गेहूं, गन्ना व कपास की उपज अच्छी होती है।
  8. इस मिट्टी के वे क्षेत्र जो प्रतिवर्ष बाढ़ से ग्रसित रहते हैं, बाढ़ के कारण वहां मिट्टी का नवीनीकरण होता रहता है। इसे खादर मिट्टी भी कहते हैं। इसमें चीका की मात्रा अधिक होती है। यह बहुत उपजाऊ होती है, इसमें चावल व गन्ने की उपज अधिक होती है।
  9. नदियों के डेल्टाई क्षेत्रों वाली मिट्टी में चीका एवं जीवांश की मात्रा अधिक होती है, अतः डेल्टाई जलोढ़ मिट्टी अत्यंत उपजाऊ होती है। इसमें चावल तथा जूट की उपज अधिक होती है

2. काली मिट्टी (Black Soil)

यह मिट्टी ज्वालामुखी उद्गार से निकले लावा द्वारा बनी है, इसलिए इसका रंग काला होता है। काले रंग के कारण ही इसे काली मिट्टी कहा जाता है। तेलुगु भाषा में काले रंग को रगेद कहते हैं। इस आधार पर इसको रेगर भी कहा जाता है।

भारत में इस मिट्टी का विस्तार लगभग 6 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में पाया जाता है। यह मुख्यतः महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ राज्य, गुजरात, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में पाई जाती है।

काली मिट्टी की विशेषताएं – Kali Mitti Ki Visheshtayen

  1. लावा से बनी होने के कारण यह मिट्टी बहुत उपजाऊ होती है।
  2. इसमें लोहा, मैग्नीशियम, चूना और एलुमिना खनिजों की मात्रा अधिक होती है।
  3. इसमें फास्फोरस, नाइट्रोजन व पोटास की कमी रहती है।
  4. इसमें जीवांश की मात्रा अधिक मिलती है।
  5. यह चिकनी होती है अतः इसमें जल धारण करने की शक्ति बहुत अधिक होती है। अतः इस मिट्टी के लिए पानी की ज्यादा आवश्यकता नहीं होती।
  6. सूखने पर यह बहुत कड़ी हो जाती है और इस पर हल चलाना कठिन हो जाता है।
  7. गर्मी में सूख जाने पर इसमें चौड़ी-चौड़ी दरारें पड़ जाती है।
  8. पानी पड़ने पर यह फूट जाती है और चिपचिपी हो जाती है। पैरों में लग जाने पर आसानी से नहीं छूटती।
  9. यह मिट्टी कपास की खेती के लिए श्रेष्ठ होती है। इसी कारण इसको कपास की काली मिट्टी भी कहा जाता है।
  10. यह मिट्टी गेहूं, चावल, ज्वार व तिलहन की पैदावार के लिए भी अच्छी होती है।
  11. यह मिट्टी शुष्क कृषि के लिए आदर्श होती है।

3. लाल मिट्टी (Red Soil)

यह मिट्टी मुख्यतः दक्षिण के पठार पर मिलती है। सर्वत्र एक जैसी नहीं होती। यह कहीं लाल, कहीं पीली, कहीं भूरी और कहीं खाकी रंग की होती है। अधिकांशतः इसका रंग लाल होता है। इस कारण इसे लाल मिट्टी कहा जाता है, क्योंकि लोहे का अंश इस मिट्टी में अधिक होता है।

जहां फेल्सपार युक्त ग्रेनाइट शैलें मिश्रित होती है वहां इस मिट्टी का रंग लाल पीला एवं भूरा होता है। भारत में इसका क्षेत्र सबसे अधिक है। इसका क्षेत्रफल लगभग 8 लाख वर्ग किलोमीटर है। यह मुख्यतः कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, दक्षिण-पूर्वी महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, दक्षिणी बिहार, उड़ीसा, गुजरात व राजस्थान में अरावली पर्वत के निकट पाई जाती है।

इस मिट्टी में जीवांश की मात्रा कम होती है। इसमें लोहा, मैग्नीशिया और एलुमिना की मात्रा अधिक रहती है। नत्रजन और चूने की कमी रहती है। यह हल्की पतली और सुरन्ध्र होती है। यह अधिक उपजाऊ नहीं होती अतः इसमें ज्वार बाजरा पैदा किया जाता है।

4. लैटराइट मिट्टी (Laterite Soil)

ग्रीक भाषा में लैट का अर्थ ईंट होता है। यह मिट्टी ईंट के रंग की होती है इसी कारण इसको लैटराइट मिट्टी कहा जाता है। यह मिट्टी लौह और एलुमिना के मिश्रण से बनती है। इसमें चूना, पोटाश और फास्फोरस तथा जीवांश की मात्रा बहुत कम होती है। अतः यह मिट्टी बहुत कम उपजाऊ होती है।

यह लंबे समय तक अपने भीतर आर्द्रता को बनाए रख सकती है। इस कारण यह कृषि योग्य होती है। यह मिट्टी मुख्यतः दक्षिणी प्रदेशों के पहाड़ी व ऊंचे भागों में तथा उड़ीसा व असम के पहाड़ी भाग में मिलती है। यह लगभग 1.5 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में पाई जाती है। यह तिलहन की फसलों के लिए विशेष उपयोगी है।

5. बलुई मिट्टी (Sandy Soil)

यह मिट्टी उन भागों में पाई जाती है जहां वर्षा बहुत कम होती है। यह मुख्यतः राजस्थान और दक्षिणी पंजाब में मिलती है। इस मिट्टी के कण छोटे-छोटे और अलग होते हैं। इसमें नमी धारण करने की शक्ति बहुत कम होती है। इसी कारण कम वर्षा वाले भागों में यह उड़ा करती है।

यह कम उपजाऊ होती है। फलस्वरुप इसमें प्रायः मोटे अनाज पैदा किए जाते हैं। बाजरा, मोंठ, मूँग, उड़द व ज्वार मुख्य फसलें हैं। सिंचाई के सहारे इसमें गेहूं भी पैदा किया जा सकता है।

6. हिमालय प्रदेश की मिट्टी (Himalyan Soil)

हिमालय प्रदेश में पाई जाने वाली मिट्टियों का अभी पूरी तरह निर्माण नहीं हो पाया है। इसके कण बहुत मोटे और गहराई कम होती है। इस प्रदेश की मिट्टी पर मुख्यतः वन उगे हुए हैं। कहीं कहीं सीढ़ी नुमा खेती भी होती है। इस प्रदेश में कई प्रकार की मिट्टियाँ मिलती हैं।

असम, पश्चिमी बंगाल, व कांगड़ा घाटी की मिट्टी में लोहा व जीवांश अधिक तथा चूना कम होता है। यह चाय की खेती के लिए अनुकूल है। इसके विपरीत उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र में चूना युक्त मिट्टी मिलती है, जिसमें चीड़ व साल के जंगल हैं। कश्मीर व हिमालय प्रदेश में कुछ जलोढ़ से मिलती-जुलती मिट्टी पाई जाती है, जो रेतीली होती है।

7. ऊसर या कल्लर मिट्टी (Saline Soil)

धरातल के कई भागों में ऊसर भूमि पाई जाती है। यह खेती के लिए बिल्कुल अनुपयुक्त होती है। कई बार नमक अथवा क्षारीय तत्व पानी के साथ मिलकर भूमि के निचले भाग में पहुंच जाते हैं। जब भूमि पानी अधिक सोख लेती है तो नीचे का खारा जल ऊपर आने लगता है।

वशीकरण से जल तो उड़ जाता है किंतु नमक की परत भूमि पर जमा हो जाती है ऐसी भूमि में कोई पैदावार नहीं होती। इसलिए इसे बंजर भूमि कहा जाता है। ऐसी मिट्टी को उत्तर प्रदेश व बिहार में “रेह” पंजाब में “कल्लर” और महाराष्ट्र व गुजरात में “चोपन” कहते हैं।

FAQ’s – Mitti Kitne Prakar Ki Hoti Hai

Q.1 भारत में मिट्टी के 6 प्रकार क्या हैं?

Ans. 1. लाल मिट्टी, 2. काली मिट्टी, 3. जलोढ़ मिट्टी, 4. ऊसर मिट्टी, 5. बलुई मिट्टी, 6. हिमालय प्रदेश की मिट्टी

Q. 2 रेगर कौन सी मिट्टी है?

Ans. ‘रेगर मिट्टी’ काली मिट्टी को कहते हैं। इसके बारे में ज्यादा जानने के लिए आप हमारे दूसरे नंबर पर काली मिट्टी पैराग्राफ को जरूर पढ़ें।

Q. 3 जलोढ़ मिट्टी का दूसरा नाम क्या है?

Ans. जलोढ़ मिट्टी को तीन भागों में बांटा गया है लेकिन यहां पर दो भागों में अलग-अलग नाम बताए गऐ हैं-

पुरातन जलोढ़ मिट्टी को बांगर मिट्टी कहते हैं तथा नूतन जलोढ़ मिट्टी को खादर मिट्टी कहते हैं।

Q. 4 लाल मिट्टी कहाँ पाई जाती है?

Ans. लाल मिट्टी मुख्यतः कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, दक्षिणी पूर्वी महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, दक्षिणी बिहार, उड़ीसा, गुजरात व राजस्थान में अरावली पर्वत के निकट पाई जाती है।

Q. 5 काली मिट्टी कहां पाई जाती है?

Ans. काली मिट्टी मुख्यतः महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में पाई जाती है।

निष्कर्ष :

तो दोस्तों आज के इस लेख में हमने आपको मिट्टी के प्रकार (Mitti Ke Prakar) के बारे में विस्तार पूर्वक जानकारी बताई है कि मिट्टी कितने प्रकार की होती है (Mitti Kitne Prakar Ki Hoti Hai) तो उम्मीद करते हैं आपको यह आर्टिकल पसंद आया होगा।

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धन्यवाद

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